इंग्लैण्ड की क्रांति/गौरवपूर्ण क्रांति(Proud revolution/England revolution) - GK Study

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इंग्लैण्ड की क्रांति/गौरवपूर्ण क्रांति(Proud revolution/England revolution)

इंग्लैण्ड की क्रांति/गौरवपूर्ण क्रांति(Proud revolution/England revolution)NTPC , RAILWAY GROUP-D , SSC , IBPS , STATE PSC , MPPSC, BPSC ,CGPSC AND MORE के लिए उपयोगी

 

 

इंग्लैण्ड की क्रांति/गौरवपूर्ण क्रांति(Proud revolution/England revolution)

 

18वीं सदी में विश्व में तीन प्रमुख क्रांतियाँ घटित हुई जिनमें 1688 में इंग्लैण्ड में घटित वैभवपूर्ण क्रांति थी। इसे रक्तहीन क्रांति भी कहा जाता है क्योंकि इसमें किसी व्यक्ति की रक्त की एक बूंद भी नहीं बही और केवल प्रदर्शन और वार्तालाप से ही पूरी क्रांति सफल हो गई।


भूमिका

1685 में इंग्लैण्ड के शासक चार्ल्स द्वितीय की मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका भाई जैम्स द्वितीय के नाम से इंग्लैण्ड के राजसिंहासन पर बैठा। राजा बनने के बाद उसने कैथोलिक धर्म का प्रचार-प्रसार किया। उसने अपनी नीति सफल बनाने के लिए लुई-14वां (फ्रांस) से प्राप्त सेना तथा धन को आधार बनाया।
1685 ई. जब फ्रांस में आतंकवाद का वातावरण प्रारंभ हो गया तो बड़ी संख्या में असंतोष शरणार्थी इंग्लैण्ड आने लगे। इससे इंग्लैण्ड में असंतोष फैला। जेम्स ने विश्व वि्द्यालय तथा सरकारी नौकरियों में कैथोलिक मतावली को ही रखा। उसके अन्य अवैध और अनुचित कार्यों से इंग्लैण्ड में तीव्र रोष और विरोध फैल गया। अंत में जेम्स को इंग्लैण्ड छोड़ना पड़ा और संसद ने उसकी बेटी मेरी को इंग्लैंड की शासिका बनाया। इस घटना को इंग्लैण्ड में महान क्रांति या वैभवपूर्ण क्रांति कहते हैं इसमें रक्त की एक बूंद भी नहीं बही और परिवर्तन हो गया अतः इसे गौरवशाली क्रांति भी कहते हैं।




क्रांति के कारण

1. जेम्स द्वितीय की निरंकुशता : जेम्स द्वितीय निरंकुश और स्वेच्छाचारी शासक था। उसने अपनी सेना में वृद्धि की ताकि जनता को आतंकित कर सके। जनता उससे त्रस्त थी। अतः जनता द्वारा जेम्स का विरोध होना स्वाभाविक था।

2. संसद द्वारा अधिकारों के लिए संघर्ष:
संसद अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करना चाहती थी तथा राजा के अधिकारों को सीमित व नियंत्रित करना चाहती थी। फलतः राजा और संसद के मध्य संघर्ष  प्रारंभ हो गया और इस संघर्ष का अंत शानदार क्रांति के के रूप में हुआ और अंत में संसद ने राजा पर विजय प्राप्त की।

3.खूनी न्यायालय:
चार्ल्स द्वितीय के अवैध  पुत्र मन्मथ ने जेम्स द्वितीय के विरुद्ध सिंहासन प्राप्ति हेतु विद्रोह कर दिया। जेम्स ने मन्मथ को युद्ध में पराजित कर दिया तथा बंदी बना लिया। उसे तथा उसके साथियों को न्यायालय द्वारा मृत्युदण्ड दे दिया गया। इसे खूनी न्यायालय कहा गया।
इसी तरह स्कॉटलैंड में अर्ल ऑफ अरगिल ने विद्रोह किया तो इसे भी जेम्स ने कठोरतापूर्वक दबा दिया तथा 300 व्यक्तियों को मृत्युदण्ड दिया तथा 800 लोगों को दास बनाकर वेस्टइंडीज भेज दिया गया। स्त्रियों और बच्चों को भी क्षमा नहीं किया गया। इस क्रूरता से जनता रुष्ट हो गयी।

4. जेम्स द्वितीय की निष्फल विदेश नीति:
जेम्स द्वितीय फ्रांस के कैथोलिक राजा लुई- 14 से आर्थिक और सैनिक सहायता प्राप्त कर इंग्लैंड में अपना निरंकुश और स्वेच्छाचारी शासन स्थापित करना चाहता था। लुई कैथोलिक था और प्रोटेस्टेटों पर अत्याचार करता था। इससे ये प्रोटेस्टेंट  इंग्लैण्ड में आकर शरण ले रहे थे। अतः इंग्लैण्डवासी और संसद सदस्य नहीं चाहते थे कि जेम्स लुई से मित्रता रखे। अतः वे उसके विरोधी हो गये।

5. कैथोलिक धर्म का प्रसार :
जेम्स  कैथोलिक धर्म का अनुयायी था जबकि इंग्लैंड की अधिकांश जनता एंग्लिकन मत की थी। वह कैथोलिकों को अधिक सुविधाएँ देता था तथा अनेक महत्वपूर्ण पदों पर भी उन्हें ही नियुक्त करता था। उसने लंदन में अनेक कैथोलिक गिरजाघर भी स्थापित किये। इससे इंग्लैण्ड की जनता उसकी विरोधी हो गई।

6. टेस्ट अधिनियम को स्थगित करना:
टेस्ट अधिनियम के अनुसार केवल एंग्लिकन  चर्च के अनुयायी ही सरकारी पदों पर रह के सकते हैं किन्तु जेम्स ने इस नियम को स्थगित कर दिया तथा अनेक कैथोलिकों को सरकारी पदों पर नियुक्त किया। अत: संसद इससे रुष्ट हो गई।

7. विश्वविद्यालयों में हस्तक्षेप :
कैथोलिक होने के कारण जेम्स ने विश्वविद्यालयों में भी ऊंचे पदों पर कैथोलिकों को नियुक्त किया। क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पद में भी कैथोलिक को नियुक्त किया। इससे प्रोटेस्टेंट समुदाय के लोग जेम्स के विरोधी हो गये।

8. धार्मिक अनुग्रहों की घोषणाएँ:
जेम्स द्वितीय ने इंग्लैण्ड को कैथोलिकों का देश बनाने के लिए दो बार धार्मिक अनुग्रहों की घोषणा की। इससे संसद में भारी असंतोष व्याप्त हो गया और वह इसकी घोर विरोधी हो गई।

9. सात पादरियों पर महाभियोग और उनको बंदी बनाया :
जेम्स ने यह आदेश दिया था कि प्रत्येक रविवार को पादरियों द्वारा चर्च में से उसकी धार्मिक घोषणाएं प्रार्थना के अवसर पर पढ़ी जाये। इसका तात्पर्य पादरी या तो अपने धर्म और मत के विरुद्ध घोषणा को पढ़े या राजा की आज्ञा का उल्लंघन करे| इस पर केंटबरी के आर्कविशप ने 6 साथियों के साथ जेम्स को एक पत्र लिखा और  निवेदन किया कि वह अपनी आज्ञा को निरस्त  कर दे और पुराने नियमों को भंग करने की  नीति को त्याग दे। इससे कुपित होकर जेम्स  ने पादरियों को बंदी बनाकर उन पर मुकदमा चलाया परन्तु न्यायालय ने उनको दोषमुक्त कर दिया। इससे जनता और सेना में जेम्स से के प्रति विरोध उत्पन्न हो गया।

 10.कोर्ट ऑफ हाई कमीशन की स्थापना:

जेम्स ने 1686 में कोर्ट ऑफ हाई कमीशन को पुन: स्थापित किया जिसके अन्तर्गत कैथोलिक धर्म की अवहेलना करने वालों पर मुकदमा चलाकर उनको दण्डित किया जाता था। 




क्रांति का महत्व/ परिणाम(Importance / result of revolution)


जेम्स द्वितीय की पहली पत्नी की मेरी नामक एक पुत्री हुई वह प्रोटेस्टेंट थी तथा हालैण्ड के राजकुमार विलियम को ब्याही थी वह भी प्रोटेस्टेंट था। इंग्लैण्डवासियों को विश्वास था कि वही इंग्लैण्ड की शासिका  बनेगी। अतः जेम्स के अत्याचारों से त्रस्त होकर मेरी और विलियम को बुलाया तथा उनके सम्मुख कुछ शर्ते रखी जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया तथा इसके साथ ही 13  फरवरी, 1689 को विलियम तथा मेरी संयुक्त रुप से इंग्लैण्ड के राजसिंहासन पर आसीन हुए।

1. स्टुअर्ट और संसद के बीच संघर्ष का अंत : इस क्रांति से स्टुअर्ट और संसद के बीच दीर्घकाल से चले आ रहे संघर्ष का अंत हो गया और अंत में संसद की विजय हुई और वास्तविक शासक संसद बन गई।

2.सम्प्रभुता संसद में निहित : क्रांति के समय संसद ने ‘बिल ऑफ राइट्स’ पारित  कर उस पर विलियम और मेरी की स्वीकृति ले ली। इससे संसद की सम्प्रभुता स्वीकार कर ली गई और राजा की सर्वोच्च सत्ता समाप्त कर दी गई। जनता की सत्ता सर्वोपरि  मान ली गई।

3. दैवी अधिकारों की समाप्ति : इस क्रांति ने राजा के दैवीय अधिकारों को समाप्त कर दिया। संसद द्वारा पारित किसी कानून को निरस्त करने का राजा का अधिकार समाप्त हो गया। राजा अब संसद के अधिकारों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकता था।

4. संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना: क्रांति से पूर्व राजा सर्वोपरि था लेकिन क्रांति के  बाद राजा की स्वेच्छाचारिता समाप्त हो गई। उसके अधिकार संसद द्वारा नियंत्रित और सीमित कर दिये गये। अब इंग्लैण्ड में एक साथ वैधानिक राजतंत्र का युग आरंभ हुआ।

5. सेना पर संसद का अधिकार : क्रांति से पूर्व सेना और उसके अधिकार राजा के अधीन थे। अब संसद ने विद्रोह अधिनियम पारित कर सेना पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया। इससे राजा की सैन्य शक्ति समाप्त  हो गई तथा सेना में व्याप्त अव्यवस्था भी दूर थे गई।

6. कैथोलिक खतरे का अंत और इंग्लैण्ड का धर्म एंग्लिकन : बिल ऑफ राइट्स में यह स्पष्ट कर दिया गया कि कोई भी कैथोलिक राजा जिसका विवाह कैथोलिक  से हुआ हो राजसिंहासन पर नहीं बैठेगा इस प्रकार  इंग्लैण्ड सदा के लिए कैथोलिक  खतरे से मुक्त हो गया तथा यह स्पष्ट कर दिया गया कि एग्लिकन धर्म इंग्लैण्ड का वास्तविक धर्म है। चर्च पर से राजा के अधिकारों का अंत कर दिया गया।

7. संसद द्वारा गृह और विदेश नीति का निर्धारण: पहले गृह और विदेश नीति का का निर्धारण राजा करता था किन्तु क्रांति के बाद गृह और विदेश नीति का निर्धारण संसद के परामर्श और स्वीकृति से किया जाने लगा। इससे इंग्लैण्ड की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और उसके औपनिवेशिक साम्राज्य का विस्तार हुआ।

8.यूरोप की राजनीति पर प्रभाव: इंग्लैण्ड  की इस शानदार क्रांति का प्रभाव यूरोप के देशों पर भी पड़ा। अब तक यूरोप में निरंकुश और स्वेच्छाचारी शासन था परन्तु इस क्रांति के कारण यूरोप में भी लोकतंत्र और वैज्ञानिक राजतंत्र के लिए आन्दोलन प्रारंभ हुए।


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